पुनर्पाठ
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हमारे बारे में

पुनर्पाठ को स्थापित करने का उद्देश्य उन साहित्यिक / आलोचनात्मक आवाजों को मंच देना है जो औपनिवेशिक सत्ता द्वारा विकृत कर दी गई भारतीय ज्ञान या चिंतन परंपरा को पुनः स्थापित करने का प्रयत्न कर रही है। भारतीय साहित्य और ज्ञान-परंपरा की समृद्ध विरासत के अनेक हिस्से औपनिवेशिक दृष्टि और उसके बाद बनी साहित्यिक धारणाओं के बीच हाशिए पर चले गए। पुनर्पाठ उन आवाज़ों और विचारों की ओर फिर से लौटने की कोशिश है।

हमारा मानना है कि किसी भी साहित्यिक परंपरा को समझने के लिए केवल उसे पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है। उसे उसके समय, समाज, इतिहास और विचारों के संदर्भ में पढ़ना भी जरूरी है। इसी कारण पुनर्पाठ का उद्देश्य केवल रचनाओं को प्रकाशित करना नहीं, बल्कि उनके साथ गंभीर संवाद की संभावना पैदा करना है।

यहाँ कविता, कहानी और आलोचना के माध्यम से साहित्य और समाज से जुड़े प्रश्नों को सामने लाने का प्रयास किया जाएगा। हमारी कोशिश है कि अलग-अलग विचारों, दृष्टियों और अनुभवों को एक ही मंच पर जगह मिले और पाठक उन्हें पढ़कर अपनी स्वतंत्र समझ विकसित कर सके। यहाँ हम किसी स्थापित निष्कर्ष को दोहराने की बजाय उन प्रश्नों की ओर लौटना चाहते हैं जिन्हें समय के साथ भुला दिया गया, दबा दिया गया या जिन पर पर्याप्त संवाद नहीं हो सका।

साहित्य केवल अतीत की स्मृति नहीं है। वह वर्तमान को समझने और भविष्य की दिशा पर विचार करने का माध्यम भी है। इसलिए पुनर्पाठ साहित्य को उसके समय से जोड़ते हुए उसे नए प्रश्नों और नई दृष्टि के साथ पढ़ने की एक छोटी सी कोशिश है। आशा करते हैं आप इससे लाभान्वित होंगे।

इस मंच/ वेबसाइट को और बेहतर किस प्रकार बनाया जा सकता है, इस बारे में आपके सुझाव आमंत्रित है। आप हमे ईमेल के जरिए लिख सकते हैं।

- संपादकद्वय ( गौरव गौतम, विष्णु सिंह जाट)